प्रयागराज (इलाहाबाद) में एक चाय वाला था “मल्हू”। शाम को सभी प्रतियोगी छात्र सब्ज़ी लेने चौराहे पर आते थे । चाय के शौकीन छात्र मल्हू के यहां इकट्ठा होते थे । मल्हू अंगीठी पर एक गन्दे से भागोने में पानी पहले से चढ़ा कर रखता था, बस छात्रों के ऑर्डर का इंतज़ार होता था जैसे ही छात्र “मल्हू च ! तीन चाय दो ” कहते। मल्हू थोड़ी सी चायपत्ती फेंकता और ज्यादा सी शक्कर डालकर बिना टाइम वेस्ट किए तीन प्याली पकड़ा देता था ।। पीने वाले भी अभ्यस्त , चाय तो बस बहाना असल में गप्पे लड़ाना होता था । उनको मल्हू से कोई शिकायत नहीं होती थी ।। यही हाल आज कल बॉलीवुड का है।जमा जमाया फॉर्मूला उठाते हैं और थोड़ी सी चायपत्ती और ज्यादा सी शक्कर मिलाकर तीन प्याली परोस देते हैं । दर्शकों को कैसा लगेगा कोई फर्क नहीं ।। पैन इण्डिया चलन ने जीना हराम कर रखा है, मगर ये दाग़ ज़िद्दी हैं । कहां मानने वाले हैं ।। अब हाल ही में आई बॉर्डर 2 को लीजिए ! मेकर्स को बॉर्डर का सीक्वल बनाने की ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी, समझ से परे है! सनी देओल को बुलाया कल्ट क्लासिक बॉर्डर की थीम उठाई । मशहूर फिल्म उरी का सबसे प्रसिद्ध दृश्य “how is the josh” को “आवाज़ कहां तक जानी चाहिए!” में पिरोया और सन्नी के चिर परिचित अंदाज़ में सन्नी का गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने को मास्टर सीन मान लिया । मगर सनी अब बूढ़े हो गए हैं । वैसा जोश भरने में नाकामयाब हुए। सनी पाजी को अब गंभीर रोल करना चाहिए जिसमें ज़रूरत से ज्यादा चिल्लाने की ज़रूरत न पड़े । दिलजीत और आहान तो ख़ैर रखे ही शहीद होने के लिए गए थे ।। वरुण धवन ज़रूर लास्ट तक , उस मरदूद पाकिस्तानी दी मुंडी उड़वाने नाल उससे संवाद करते रहे ।। लेकिन घायल सैनिक (ऑल मोस्ट मरा हुआ सैनिक) अचानक ही कब क्यूँ कैसे ! वास्तविकता से अधिक ऊर्जा के साथ जी गया , भगवान जाने या निर्देशक स्वयं ।। वही घिसा पिटा फैमिली ड्रामा थीम । हालांकि फ़ैमिली इमोशंस को निर्देशक ने अच्छा उभारा है मगर कितना उबाऊ होता है ! कई कई बार देखा हुआ फ़िर बार बार देखना ।। मैं तो यही कहूँगा बॉर्डर की लेगेसी के साथ अन्याय है फ़िल्म बॉर्डर 2 ।।
बॉर्डर 1997 एक नज़र 
ओरिजिनल बॉर्डर का एक एक चरित्र , अपनी अलग पहचान के साथ सदियों तक याद रखा जाने वाला है । सुनील सा बंद आंखों से अपनी धरती मां को प्यार करने वाला, मथुरा दास सा प्रैक्टिकल और कैलकुलेटिव इमोशन का आदमी कैसे जंग को अपनी हर बात से ज़्यादा महत्व दे बैठा, सनी देओल सा सनकी अफ़सर, जो लोंगेवाला पोस्ट नहीं छोड़ेगा चाहे अपनी बीवी को क्यों न छोड़ना पड़े , अक्षय खन्ना सा अपरिपक्व नवजवान जिसने अभी जीवन देखा ही नहीं और खड़ा है ज़िन्दगी और मौत के बीच लड़े जा रहे जंग के मैदान में ।। हर सीन इंटेंस । हर सीन यादगार । उस सैन्य टुकड़ी के हर सैनिक फ़िल्म के चिड़िया नाल बाज़ लड़ाऊं अर्थात मुट्ठी भर सैनिक की सनक ने हज़ारों दुश्मनों को परास्त कर दिया वाली थीम को जस्टिफाई करते हुए सनकी दिखते ही थे । सारे के सारे ।। देखकर लगता ही था अबे वे पाकिस्तान ! बुरी नियत से इधर आने वाले को ज़िन्दा नहीं जाने देंगे, ये वतन के दीवाने ।। सैनिक बॉर्डर पर रहते हुए फ़ैमिली के लिए कैसा फील करता है कि सबसे सुन्दर मनोवैज्ञानिक चित्रण वाली फ़िल्म थी, “बॉर्डर” ।।
बॉर्डर 2 बनाकर उस लेगेसी के साथ जस्टिस नहीं किया गया है ।
वहीं बॉर्डर 2 बनाकर उस लेगेसी के साथ जस्टिस नहीं किया गया है । मैं तो कहता हूं अगर अगली कड़ी डिलीवर न करे तो किसी भी फ़िल्म का “2” लाया ही क्यों जाना चाहिए ?? क्या सिर्फ़ बॉक्स ऑफिस की सफ़लता भुनाने के लिए ?? कुछेक सीन्स को छोड़ दिया जाए तो पूरी फ़िल्म जबरदस्ती में बनाई गई और जबरदस्ती दिखाने की कोशिश भी करती है।। गाने ठीक हैं पर सारे गाने भी उस लेगेसी के आगे पानी मांगते हैं । हां “घर कब आओगे” सुनकर एक फ्रेशनेश ज़रूर फील हुआ ।। निर्देशक अनुराग सिंह एक प्रतिभावान निर्देशक हैं उन्होंने केशरी जैसी कल्ट क्लासिक फ़िल्म डिलीवर की है । उनके हैंड से फ़िल्म में कोई कमी नहीं कही जाएगी । सिनेमाई नहीं परन्तु भाव उकेरने की नज़र में एक स्वतंत्र रूप से फ़िल्म ठीक ठाक बन पड़ी है मगर उस लेगेसी का क्या ?? जिसकी लोकप्रियता को कैश करना ही मेकर्स का एक मात्र इरादा रहा ।। फ़िल्मों के नाम पर ऐसी कंगाली शायद इसलिए कि आउटसाइडर का रिश्क़ नहीं लेना है, बस फॉर्मूला उठाना है और घोल घाल कर एक फ़िल्म परोस देनी है ।। बॉलीवुड को मल्हू चाय की तरह पीने वाले को कैसी लगेगी रत्ती भर सोचना भी नहीं ।। जब आप किसी महान का नाम इस्तेमाल करते हैं तब उसकी तुलना से बचना मुश्किल होता है । इसलिए बॉलीवुड को इससे बचना चाहिए। आख़िर फ़िल्मों में फॉर्मूला से कब ऊबेगा, अपना बॉलीवुड !!
पेड प्रमोशन बना हथियार
आज कल बॉलीवुड में नया ट्रेंड चला है । समीक्षकों को चैनल्स से लेकर सोशल मीडिया तक पैकेट पहुंचा दो, सौ दो सौ तक तो कमाई का आंकड़ा पहुँच ही जायेगा । बॉर्डर 2 में भी जमकर पेड प्रमोशन का बहार देखने को मिला । हर तरफ़ बॉर्डर 2 के जलवे दिखाने की कोशिश की गयी ।
फाइनल वर्डिक्ट
बॉर्डर 2 एक स्वतंत्र रूप से परिवार के साथ देखि जाने वाली साफ़ सुथरी और एक अच्छी फ़िल्म है ।परन्तु बॉर्डर 2 नाम से बनाना और इस फ़िल्म को बनाना ही ज़रूरी था ऐसी कौन सी मजबूरी रही होगी ये तो सिर्फ़ मेकर्स ही बता सकते हैं।

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