अक्षय खन्ना की फ़िल्म है, धुरंधर।

“हिन्दू डरपोक होते हैं” सुनकर शरीर क्रोध से कांप उठे और हाथ की मुट्ठियां बंधते ही कोई रोककर कह दे — “न ! ये हमारे विजन को सूट नहीं करता । हम चंद लोगों की बेवकूफियों और उकसावे में आकर ऐसा कुछ नहीं करने जा रहे जो हमारे शान्तिप्रिय “स्प्रिट” को ठेस पहुंचाए। आर. माधवन ने अपने चेहरे के एक्सप्रेशन से जो बेबसी हमें दिखाई है, मेरा ख़्याल है हर वह गरम दल का समर्थक हुबहु महसूस कर पाया होगा जिसे “दूध मांगोगे तो खीर देंगे कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे” वाले संवाद उद्वेलित कर देते हैं। फ़िल्म धुरंधर के सिनेमाई क़ला की बात करने से पहले उसके नैरेटिव अर्थात उसके उस मुद्दे पर बात करना ज़रूरी है जो बहुत से लोगों को परेशान कर रहा है। इसमें कोई या किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए कि कंधार में विमान हाईजैक कर आतंकियों को हमारे ही भारत से छुड़ाया गया था। मैं बहुत बच्चा था जब हमारी संसद पर अटैक कर पूरे देश को हिला दिया गया था। आपको यक़ीन करना चाहिए कि एक बच्चे के रूप में जब हमको भेड़िया और भूत से डरना चाहिए था तब हम रामगढ़ के बच्चों की तरह गब्बर यानी आतंकवादियों से डरकर जी रहे थे। जहां सरकारें उठती – बैठती, चलती- बोलती हैं, वहां ही आतंकी हमला हो जाए तो आम नागरिक आखिर किस आशा और भरोसे पर एक चैन भरी नींद सोता !!?? ।।। ताज हमले के वक़्त तो हम लोग इतने होशदार हो गए थे कि दो दिनों तक टी वी पर ही चिपके रहकर उनकी चींखें महसूस करते रहे थे जो सिर्फ़ हिन्दुस्तानी और ख़ास तौर पर हिन्दू होने की सज़ा भुगतते हुए सिर्फ़ आधे सेकंड में मौत के घाट उतार दिए गए थे, टेबल और पर्दे के पीछे चिपके लोगों की “शायद बच जाएं” की आशा कई गोलियों के एक साथ सीने में घुसने के साथ टूटने के बाद की खामोशी हमें आज तक महसूस होती है। इसे कहने या सुनने में किसी को भी दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि इस घटना के बाद भी हम पलटवार नहीं कर पाए थे बदले में अगर कुछ किया था तो संयुक्त राष्ट्र संघ में बैठकें, शिकायतें और थोड़ा अधिक तो आगे पीछे अगले बगले झांककर आंखे लाल करते हुए ये कहा था कि हमें पकड़कर रखो वरना हम इन सबों का नामों निशान मिटा देंगे। बस यही तो कहती है फ़िल्म !! धुरंधर। इसमें किसे चिढ़ होना चाहिए भला !!! 2001 संसद पर हमला सरकार nda की प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल जी।। इन्दिरा जी आयरन लेडी थीं । अगर चीख चीख कर कहा जाए तो क्या ही ख़ीज क्या ही चिढ़ !! पाकिस्तान और बांग्लादेश के आंतरिक मसले को अपने हस्तक्षेप से अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था इन्दिरा जी ने। यह सुनकर किसे ख़राब लगना चाहिए भला !! यह तो किया ही था। ऐसे ही अगर कहा जाए कि विमान के बदले आतंकी छोड़ा गया था तो क्या ही ग़लत कहा जाएगा !!!! अब इसे प्रोपोगेंडा कहा जाए तो कहा जाए!! किसे फ़र्क पड़ता है ।। ज्यादा दर्द होगा तो फ़िल्म बुलेट हो जाएगी। ये मोदी गवर्नमेंट है। मोदी एंड टीम तगड़े पी. आर. की शौक़ीन है ।। करे और दिखा न पाए ! ऐसा इस सरकार से तो मुमकिन नहीं मालूम पड़ता ।। बल्कि ये कहा जाए जो नहीं किया, कहो तो थोड़ा उसे भी दिखा ही डाले ।।। अब मन्दिर बनवाए और कहे भी न , आतंकी गतिविधियां लगभग रोक ले जाए और बताए भी न ।। ऐसा सुख तो मोदी सरकार देने से रही ।। अजय ब्रह्मात्मज सरीखे बुजुर्ग चाहे जितना रुदन करें मोदी रहम करने से रहे। बस इतना ही है प्रोपोगेंडा कि जो नहीं किया किसी ने और जो किया गया किसी के द्वारा, तुलनात्मक रूप से दिखाने की कोशिश की जा रही है । कुछ लोग चाहते हैं– तुम अपने मुंह मियां मिट्ठू चाहे तो बन भी लो लेकिन हमारा नाम लेकर ये मत कहो कि तुमने यह नहीं किया और हमने किया। लेकिन सॉरी दोस्त मोदी सरकार से ऐसी संवेदनशीलता की उम्मीद न ही की जाए तो बेहतर। यह सरकार कहती है कि तुम्हारे दौर की फ़िल्मों में 786 के बिल्ले की वजह से एक मन्दिर में न जाने वाला नायक गोली से बच जाता था और हमारे दौर का सिनेमा हर हर महादेव कहने में ऊर्जा महसूस करता है। और इसे हम सीना ठोककर कहते हैं ।।

अब बात फ़िल्म के सिनेमाई कला की ….

दरअसल एक लाइन में कहा जाए तो फ़िल्म धांसू बन पड़ी है ।। कुछेक अनावश्यक दृश्य को कम करके थोड़ा और ग्रीपिंग की जा सकती थी ।। अक्षय खन्ना का अभिनय, एक्सप्रेशंस कमाल के हैं। जो तारीफ़ उन्हें चारो ओर मिल रही है उसके वे असली हक़दार हैं ।। ख़ास तौर पर उनके अभिनय की बारीकियां मुझे तब बड़ी प्यारी लगीं जब वे साइलेंट एक्सप्रेशन से किरदार जी रहे थे । जैसे जब रहमान डकैत का बड़ा लड़का मारा गया और रहमान उसे देखने पहुंचे तो उनके लटकते हुए गाल और ठूडडीयां ऐसे कांप रहे थे मानो बात पर्दे की न होकर किसी का लड़का सच मारा गया हो और बाप कांप उठा हो ।। ऐसा ही एक दृश्य है, जब एस पी असलम, रहमान को पकड़कर ले जा रहा होता है तब रहमान कहता है “रहमान डकैत का खून है तमीज़ से बहाना “” इतना कहने पर एस पी उसके सर पर थप्पड़ थप्पड़ मारता है और वहां अक्षय खन्ना का अपने सर का बचाव का जो रिएक्ट होता है वह एकदम नेचुरल रिएक्शन होता है ।। ऐसे ही एक और दृश्य में जो वायरल डांस वाला सीन है उसमें नाचते नाचते रहमान का शर्मीली हंसी हंसना ये दिखाता है कि जनरली रहमान नाचता कूदता किरदार नहीं है लेकिन आज बड़ा खुश है। हम असल जीवन में भी कई बार ऐसा फेस करते हैं । ऐसे अभिनय सीन्स अक्षय खन्ना को लोगों के दिलों में सीधा उतार देते हैं।। रणवीर सिंह ने कमाल का अभिनय किया है ,कमाल का मतलब कमाल का ।। रीलबाज़ जेनरेशन भले न समझे लेकिन ताज़ हमले का लाइव शो देखकर पाकिस्तानियों के आलाकमान के जश्न मनाते टाइम एक भारतीय का जो दर्द एक जासूस के सीने में उठकर फट जाना चाहता है मगर सिस्टम के लिए उस दर्द को अंदर ही अन्दर दबाना पड़ता है उसे रणवीर सिंह ने खूब दिखा दिया है, एक दृश्य में जब मेजर इकबाल हिंदुस्तानी जासूस को बेरहम मौत मारता है तो उसे न बचा पाने की टीस,  वो गुस्सा , वो दर्द, रणवीर सिंह रहमान के खानसामे की उंगलियां काटकर उसके ऊपर उतार देता है । ये सीन रोंगटे खड़े कर देने वाला है ।।। एक मुख्यधारा का स्टार जब बिना मेकअप का गेटअप धारण कर पूरी फिल्म में वहां के किरदारों के पीछे दिखाई देता है , तब अनायास ही निकल जाता यही तो करते हैं जासूस ।। रणवीर ने हॉलीवुड अभिनेताओं की तरह ‘ प्रयोग’ किया है ।। कम डायलॉगबाज़ी आंखों और चेहरे से वो सब कह देना जो कहानी कहना चाहती है ।।। फ़िल्म के सारे किरदार पावरफुल हैं और सारी कास्टिंग भी।। मेजर इक़बाल बने अर्जुन तो क्या ही कहने !! वो कसाईनुमा मौत वाले डायलॉग पर अर्जुन की स्माइल , एक्सप्रेशन देखो !! मज़ा आ जाता है ।। सेकंड पार्ट में इनका रोल और फोकस में आएगा ।। राकेश बेदी अहा लाज़वाब!! तीनों बंदे अपने अपने विजन को लिए हुए जी रहे हैं । अक्षय लोकल परन्तु रूह कंपा देने वाला ख़तरनाक बन्दा हमेशा दिख रहा है, अर्जुन पूरी isi का आलाकमान जैसा औरा लिए हुए रहता है और रणबीर सिंह एक गुप्त आदमी हमेशा इस बात से डरा हुआ कि उसकी असलियत वक़्त से पहले खुल न जाए ।। फ़िल्म नहीं मज़ा है मज़ा लाईटली देखा जाए मज़ा आ जाएगा ।।
अब बात आदित्य धर की ।। निर्देशन कमाल का है । जज़्बा और हिम्मत भी कमाल की है ।। मुख्यधारा के स्टार को पीछे रखकर एक सपोर्टिंग कास्ट बन चुके अभिनेता को स्टार बना दिया ।।। ये रिस्की था ।।। मगर आदित्य धर ने ये रिस्क लिया ।।। और फ़िल्म ने डूबते बॉलीवुड को बचा लिया ।। धुरंधर तूफ़ान है ।। इसके अगले पार्ट्स सैलाब बनकर आयेंगे सैलाब ।।। देख लेना ।। बॉक्स ऑफिस सैलाब में बह जाएगा ।।। बस थोड़ा थोड़ा डायलॉग प्रोपोगेंडा type है जिससे बचना चाहिए था ।।। एडिटर साब का काम भी कमाल है। बस थोड़ा लेट से घर जाते तो दर्शक जल्दी घर आ पाते मात्र यही कहना है ।।। आगे देखते हैं बड़े साहब कौन हैं ????

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